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LOONKARANSAR, RAJASTHAN, India
..कि स्वंय की तलाश जारी है अपने और बैगानों के बीच !!

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

वाक इन इन्टरव्यू

फ्रांस से राजस्थानी संस्कृति पर शोध करने आई
''इलोदी'' और ''नादेज़'' को राजस्थानी संस्कृति
से रू-ब-रू करवाते राज बिजारनियाँ !

पर्दे के पीछे

फ़िल्म निर्माता नवीन टाक से रू-ब-रू होते राज

राजस्थान पत्रिका में छपी राज की

राजस्थानी पोथी ''कुचमादी टाबर'' की समीक्षा !

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

अंतसतास

अपने और बैगानों में ख़ुद की तलाश..!

लोक संस्कृति की मिठास लिए विभिन्न बातों- ख्यातों और गीतों-रीतों की पैरवी करते रेतीले धोरों की पैदाईश हूँ मैं.! दो दशक पहले अपना अस्तित्व गवां चुके लूनकरनसर तहसील के गाँव ''मोटोलाई'' में मेरा जन्म हुआ ! अपनी जमीन से बिछुड़ने का दर्द क्या होता है, यह महसूस किया है मैंने अपनों की आंखों में.!

कभी चौपाल तो कभी एक ही बाखल में हुक्कों से उठते धुंए चिलम के चस्कों के बीच घुटने वाली हथाई की सुनहली यादें आज भी मेरे अपनों की धुंधलाई आंखों में साफ-साफ नजर आती है! १९८४ से १९८७ के बीच ''महाजन फील्ड फायरिंग रेंज'' के अंतर्गत 'गाँव उठाऊ' कार्रवाई की भेंट चढ़ गया मेरा अपना गाँव॥मेरा अपना घर...और सैंकडों ख़ुद मेरे अपने...!!

तन्हा पीछे छोड़ गया है जाने वाला यादों को,

फिर भी कितने लाड प्यार से हमने पाला यादों को,

नंगे पाँव मिले रस्ते में जब पलकों को गुजरे दिन,

फूट-फूटकर घंटों रोया पाँव का छाला यादों को !!

इस शेर की यह पंक्तियाँ रह-रहकर बिछोह की पीड़ा को फिर से जीवंत कर देती है! उन धोरों में कलकल बहती लोक संस्कृति और लोक गीतों की वैतरणी का मुझ पर ऐसा असर पड़ा कि मेरे हाथों में थमी आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने वाली कूंची का सहचर्य कलम भी करने लगी!

बस, तबसे कूंची और कलम की संगत जारी है! कभी लेखन, कभी पेंटिग, कभी रंगमंच, कभी मिमिक्री तो कभी एंकरिंग तथा पत्रकारिता के बहाने लोगों से जुड़ने का प्रयास भी मानवीय स्वार्थवश कर रहा हूँ, या यूँ कह लीजिए ख़ुद को तलाशने की कवायद बदस्तूर जारी है॥!!

सोमवार, 1 सितंबर 2008

जरा हटके...!

!!........!!

स्याही कागज पर गिरके 'राज',

तकदीरे फ़साना लिखती है !

बनकर फिर अखबार कोई,

इतिहासे जमाना लिखती है !

लोग गवाही देते हैं ,

संग शब्द साक्षी बनते है !

दग्द हृदय के छालों का फिर,

करके बहाना लिखती है !!

रविवार, 31 अगस्त 2008

राज बिजारनियाँ की छोटी कविताएँ

राम होने के लिए

हर युग में

राम को

ईश्वरत्व प्राप्ति के लिए

आवश्यकता पड़ती है

किसी ना किसी

रावण की.!

बाखल

पुरखों संग जुड़ा

बरसों पुराना

नाता तोड़कर

दहलीज को लाँघ

कमरे में

करीने से

सज्जे बेड पर

सिमट कर

आ बैठी है

बाखळ.!

थाली में श्मसान.!

अरी ! ओ

नन्ही सी जीभ!

अपने

क्षणिक स्वाद खातिर

क्यों बना देती हो तुम..

थाली में श्मसान.!

प्रश्न

हर बार

स्टोव फटने के बाद

क्यों आती है

सिर्फ

बहुओं के

जलने की ख़बर.!

क्या सास साथ लेकर

जन्मती है''स्टोव प्रुफ'' कवच.!

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

गीत

हमारी याद आएगी..!

(-राज बिजारनियाँ )

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

उठेगी हूक जो दिल में, तुम्हे रह-रहके रुलाएगी

कोई तनहा हो सोएगा

कोई यादें संजोएगा

कोई छुप-छुपके रोएगा

कोई पलकें भिगोएगा

करेंगे लाख कोशिशें, सभी नाकाम जाएगी

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

कभी तकरार की बातें

कभी खुशियों की सौगातें

कभी वो रूठना हमसे

कभी फूलों से महकाते

वक्त तो रेत है ऐसी, हाथ से छूट जाएगी

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

यहीं पाना यहीं खोना यहीं हंसना

यहीं रोना यहीं कहना यहीं सहना

यहीं जीना यहीं मरना

जिंदगी छाँव है ऐसी, कभी ना हाथ आएगी

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

राजस्थानी गंगा

ग़ज़ल

( राज बिजारनियाँ )

पाप रा धूप जळावै क्यूं

काया रोज गळावै क्यूं

काचरिया रो मोह छोडनै

तूम्बा बैल बधावै क्यूं

जिया जूण रा सांसा इतरा

मनडै नै भरमावै क्यूं

खोटा-खोटा काम घणा कर

जीवन बिरथ गमावै क्यूं

करम थांरा ई आडा आवै

आंसूडा ढळकावै क्यूं

ले गेंहू रा स्वाद सबडका

बाजरडी बिसरावै क्यूं