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..कि स्वंय की तलाश जारी है अपने और बैगानों के बीच !!

शनिवार, 8 मार्च 2014

'चाल भतूळिया रेत रमां' कवि कथाकारा री दीठ में


राजस्थानी रा चावाठावा कवि कथाकार
* मानजोग ओमपुरोहित 'कागद',
* मानजोग डॉ. नीरज दइया
* मानजोग श्री कृष्ण जुगनू जी,
* मानजोग आईदानसिंह जी भाटी,
* मानजोग अश्वनी जी शर्मा
* मानजोग डॉ.मदन गोपाल लढ़ा 
मानजोग श्रीभगवान सैनी री दीठ में
म्हारो कविता संग्रै 'चाल भतूळिया रेत रमां'

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जूण रा आंटां नै अंवेरती कवितावां
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- ओमपुरोहित 'कागद'
- 09414380571

धोरां धरती लूणकरणसर (बीकानेर) रै मोटोलार्इ गांव में जलम्या राजूराम बिजारणियां 'राज राजस्थानी री नूंवी पीढी रा ऊरमावान कवि-कथाकार है। फायरिंग रेंज री थरपणां सारू मोटोलाइ रै उजड़ा पछै लूणकरणसर में रैवास।

हिन्दी, राजस्थानी में स्नातकोत्तर साथै बी.एड. ताणी भणार्इ। राजस्थानी स्नातकोत्तर में युनिवर्सिटी में मैरिट हासल करी। कलम रै साथै कूंची रा धणी अर रंगकर्मी र्इ है। राजस्थानी बाल कथावां री पोथी ''कुचमादी टाबर(1998) ''चाल भतूळिया रेत रमां(2012) रै साथै पत्र-पत्रिकावां में रचनावां लगोलग प्रकाशित। सुतंतर चित्र प्रदर्शनियां रै अलावा केर्इ चितराम पोथ्यां रा आवरण बण चुक्या है। स्वास्थ्य मंत्रालय कानीं सूं दूरदर्शन सारू बणी डोक्यूमेंट्री में अभिनय। पत्रकारिता रै साथै टीवी अर रेडियो सूं र्इ जुड़ाव।

राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी रै मनुज देपावत, भत्तमाल जोशी, जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार अर राजस्थान पाठî पुस्तक मण्डल रै कहानी पुरस्कार अर बीकानेर रै अलंकार 2008 समेत केर्इ मान-सनमानां सूं आदरीज्या बिजारणियां कवि सम्मेलनां माथै सुरीलै कंठां में काव्य पाठ अर मंच संयोजन सारू र्इ जाणीजै। मायड़ भाषा री मानता सारू आंदोलण रा समर्पित सिपाही। अंतरजाळ रै आंगणैं राजस्थानी रा रंग बरसावण पेटै खास काम।
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कविता आपरै बगत रो पड़बिम्ब होवै। खास कर उण बगत जद कवि जमीन सूं जुड़ कवितार्इ करै अनै आपरै ओळै-दोळै रै बिम्बां में निजू संवेदणां नै परोटै। उण रै उण निज में जगती भंवै। राजूराम बिजारणियां 'राज रै ''चाल भतूळिया रेत रमां'' कविता संग्रै नै बांचता इण बात री साख सवार्इ होवै।

राजूराम बिजारणियां 'राज रै इण कविता संग्रै री च्यार खंडां में सामल 61 कवितावां मुरधर माथै जूण रा आंटां नै अंवेरती बगै अनै जूण री अबखायां रा चितराम कोरै। कमती सबदां में गूंथीज्योड़ी आं कवितावां री छोटी-छोटी ओळयां में जूण री झीणी अनै अणथाग अकूंत संवेदणावां परोटीजी है।

''चाल भतूळिया रेत रमां री कविता में काळ री मार, बिरखा री चावना, रूंखां रो तप, रेत रो मरम सामल है तो तरक्की रा ताकळां सूं बिंधीजती धरती री पीड़ भी है। प्रीत रा नूवां चितराम आखी धरा सूं गळबांथ घालता बगै।

इण कविता संग्रै नै ''मन री सींव पसरग्यो मून खंड एक निरवाळो संग्रै बणा देवै। इण खंड री कवितावां सेना रै युद्धाभ्यास सारू खाली करवार्इज्या 33 गांवां रै उजड़ण री पीड़ अंवेरीजी है। इण खंड रै एक-एक चितराम में गांवां री अंतस तास परगटै

राजूराम बिजारणियां 'राज री कविता दीठ खासा ऊंडी है। मुरधर रै भंडाण छेतर री बोली रा सबद अनै जूण जतन रा अबोट दीठाव कविता री मारक खिमता नै और बधावै। आस जगावै कै राजूराम बिजारणियां 'राज राजस्थानी कविता में ठार्इ अनै ओपती ठौड़ बणायसी। भविख रै इण लूंठै कवि नै घणां-घणां रंग।

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कविता रचण रो आंटो आयग्यो
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-डॉ. नीरज दइया


आभै रै लूमतै बादळ सूं 
छुड़ाय हाथ
मुळकती-ढुळकती 
बा नान्ही-सी छांट!
छोड़ देह रो खोळ 
 सैहपरी बिछोह…!
गळगी-हेत में 
रळगी-रेत में।

आखर-आखर जुड़ सबद बणै अर सबद-सबद सावळ भेळा होयां कोई ओळी रचीजै। सबदां रो भाईपो किणी ओळी नै कदैई गद्य तो कदैई पद्य री ओळख सूंपै। आज विधावां री सींवां घणी नजीक आयगी है। आं मांयलो झीणो भेद समझण खातर अेक दीठ री दरकार होया करै। कोई ओळी कविता कद बणै अर उण ओळी रै जोड़ में किसी ओळी राखीज सकै, समझ इण संग्रै री केई कवितावां मांय देखी जाय सकै।

राजूराम बिजारणिया रो कवि मन आपरै आसै-पासै रै संसार मांय रमै। आपरै निजू जगत सूं जुड़ाव राखती आं कवितावां मांय जूण री अबखायां-अंवळायां सोरप-दोरप भेळै जिका रंग परोटीज्या है वै लांबै बगत तांई चेतै रैवैला। न्यारै न्यारै खंडां मांय राखीजी आं कवितावां रा केई सबळा चितराम नवी राजस्थानी कविता री ओप बधावैला। काळ रा सुर तो हरेक कवि उगेरै उगेरै, पण अठै गांव रै उजड़ण री जिकी पीड़ कविता रै मारफत राखीजी है वा काळजै ऊंडै उतरै।

चाल भतूळिया रेत रमांपोथी री कवितावां बांच लखावै कै कवि नै कविता रचण रो आंटो आयग्यो है। वो आपरै आसै-पासै रै संसार नै काव्य-विवेक रै पाण सांवठै रूप मांय आपां साम्हीं राखै। इण संग्रै री तीन खासियतां गिणा साकां- विसय री विविधता, भासा री समझ अर सांवठी बुणगट। युवा कवि राजूराम बिजारणिया नै कविता रै मारग लांबी जातरा सारू मंगळकामनावां।

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राजस्थानी अहसास वाली कविताएं
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- श्री कृष्ण जुगनू

कविता और कलम के धारण करने वालों में एक नाम है राजूराम बिजारणियां 'राज' राजस्थान के लूणकरणसर में रहते हैं। मूलत: उस मोटोलाई गांव के है जहां फायरिंग रेंज की स्थापना हुई तो विस्थापित होकर लूणकरणसर बसे। हिंदी और राजस्थानी में स्नातकोत्तर और बीएड 'राज' बाल साहित्य के साथ ही कहानी और कविताएं लिखते रहते हैं, लगातार छपते भी हैं और कई पुरस्कार भी लिए हैं।

हाल ही 'राज' की एक पुस्तक पढने को मिली- 'चाल भतूलिया रेत रमां।' मित्रवर मायामृगजी की भेजी उन सौ किताबों में थी, जिन पर राजस्थान और राजस्थानी वाले अभिमान कर सकते हैं। अन्य साहित्यकार भी सोच सकते हैं कि राजस्थान में कितना लिखा जा रहा है और राजस्थानी के भंडार को भरा जा रहा है। कल तक केवल डिंगल के रूप-रंग से परिचित रही वीरों के उत्साह की हितैंषी रही भाषा में प्रासंगिक विषयों पर आज कितना लिखा जा रहा है, यह यहां के समकालीन साहित्य को देखकर ही जाना जा सकता है।

राजूजी की यह किताब मेरे हाथ में करीब चार दिन तक रही और मुझे पता चला कि यह चार ही भागों को लिए है - 1. आस रै जूण गेडै, 2. चाल भतूलिया रेत रमां, 3. नेह बांटती मा और 4. मन री थळगट पसरयो मून। इन्हीं शीर्षकों में राजूजी ने अपनी कविताओं का रचाव और जमाव किया है, उस मेहंदी की तरह जो भले ही हरी लगती है मगर रचती लाल है। राजस्थानी की ये रचनाएं अपने आपमें विशद अर्थन्यास करती प्रतीति देती है, उनके अपने बिंब राजस्थान के परिवेश से बहुत घुले-मिले हैं, पहली ही कविता में राजू कहते है-

आभै रै लूमतै बादळ सूं
छुडाय हाथ
मुळकती-ढुळकती
बा नान्ही सी छांट !
छोड देह रो खोळ,
सैह'परी बिछोह...!
गळगी हेत में,
रळगी रेत में।
(पेज 11)

अपने हिंदी मित्रों के लिए इसका अनुवाद शायद इस रूप में उचित ही लगेगा -
गगन के झूमते मेघ से
छुडाकर हाथ
मुस्काती-गिरती
वह नन्हीं सी बूंद !
छोडकर देह का खोल,
सह पडी बिछोह...!
गुल गई लगाव में,
मिल गई बालु में।

सच में इस तरह का अहसास रेगिस्तान वालों का ही हो सकता है कि यहां के आसमान में मंडराने वाले बादलों की एक-एक बूंद पानी में गिरकर उसकाे विस्तार नहीं देती, बल्कि अपना अस्तित्व मिटाती सी प्रतीति देती है। यहां की आंखें ही देखती है भतूलिया को जिसे रेतीले अंधड के रूप समझा जा सकता है। यह चक्रवाती नहीं होता, यह यहां की सामान्य और असामान्य घटना भी है। ये बहुत आम शब्द है, अज्ञेय ने कभी 'घूर्ण' शब्द ऐसे परिवेशजन्य घटना के लिए प्रयोग किया है। गीता में कहा है कि आकाश में जैसे वायु व्याप्त है, इस बात को यहां के निवासी भली प्रकार जा सकते हैं।

राजस्थान वाले ही यह मान्यता रखते हैं कि कभी भूतालिया या भतूलिया आए तो उसमें जूता फेंकने से दोष दूर होते हैं आैर राशि मिलती है... भतूलिया का चित्रण राजूजी ने कई स्थानों पर किया है। एक कविता राजस्थानी मठौठ की है, देखियेगा-

सुंवारता बांकडली मूछ्यां
फेरता मूंडे हाथ
भरता मनडै मोद

उठायां सिर गुमैज सूं
धरतां लाम्बा-लाम्बा डिग
देख...
धोर ढळतै
छेल भंवर भतूलियै नै
खाथी खाथी
पग उठावती
बा बळखावती
जुवान रेत...!
करती सावचेत टोकी नै
लुकगी सरड दाणीं
मा पडाल री ओट में।

यह अभिव्यक्ति हिंदी वालों को भी मुश्किल नहीं होगी। मगर, यह अहसास जरूर थार वालों को ही सुलभ हो सकता है। राजूजी ने अपनी कविताओं को जो भूमि प्रदान की है, वह उनकी अपनी नहीं, पूरे प्रदेश की है, वे शब्द पूरे ही प्रदेश के हैं, ये जहां भी बोले जाते हैं, वहां मरु की अपनी गंध है, सुगंध है। हालांकि यह गंध हिंदी ने न्यारी नहीं, मगर करीब भी नहीं लगेगी, यह निराली है, इसका अहसास इस किताब के बहाने लिया ही जा सकता है। देखिये बाखळ कविता की भावभूमि :

दादां-पडदादां सागै
जूड्योडो
बरसां जूनाे
गनो तोड
थळी नै फदाक'
साळ में
फुटरापै सूं सज्योडै
माचै माथै
' बैठगी
बाखळ !

है राजस्थानी का अपना रंग, बस यही फर्क है पानीदार इलाके की कविता और मरू की कविता में, अहसासों की अपनी-अपनी भूमि है, अपने अपने भाव है। और, ऐसे ही चित्रण को शब्द देती है- चाल भतूलिया रेत रमां। पठनीय और पारायणीय कृति।
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पुस्तक - चाल भतूलिया रेत रमां
कवि - राजूराम बिजारणियां 'राज'
प्रकाशक - बोधि प्रकाशन, एफ 77 सेक्टर 9, रोड नंबर 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर 302006
पृष्ठ 96, मूल्य 85 रूपए।

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थारा आखरां में म्हारी लिखियोङी
जूनी अर नवी कवितावां री छिब
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-आईदानसिंह जी भाटी

प्रिय श्री राजूराम जी,
 सहेत नमस्कार।

थांरी किताब बांची। चाल भतूळिया रेत रमां। म्हनै थारा आखरां में म्हारी लिखियोङी जूनी अर नवी कवितावां री छिब मिळी। "धरती होळै भंवै", "बुगचौ" इत्याद कवितावां अर कीं दूजी कवितावां। जीव सोरौ हुयग्यौ। विकास रै नावं माथै ऊजङता घर-गांव। ऊजङतौ सपनां रौ संसार। नुगरा कांई जाणै सपनां रौ मरम.! गांव-गोरवां रौ अरथ.!! थांरी कवितावां में सपना पळै। प्रीत अर हेज रा सपना।सपनां में जिकौ फूटरापौ, जिका रंग थै भरिया हौ, वै रंग मिनखपणै रा रंग है.!

म्हैं हरीशजी भादाणी अर माणिक बच्छावत री कवितावां पछै इतरी फूटरी रीत माथै थांरी कवितावां बांची। रेत री संस्क्रिति नै "विकास" नांव रौ आथूणौ अधकचरौ कांई भतूळियौ उडा नीं नाखसी.? कांई थारी दीठ रै हेत सूं रेत सूं रम सकैला.? म्हरै ऐथ तौ ऐक बखत नारौ हौ -"रेगिस्तान हटावौ अर अबै म्हनै लागै, नारौ लगावणौ पङैला--"रेगिस्तान बचाऔ" विकास रै नांव माथै सपनां रौ "विणास" कींकर देख्यौ जावै.? थांरी कवितावां इण कथिथ विकास री थाप खायोङी कवितावां है, पण थाप सांमी उभी मुळकै। मुळक इण कवितावां री खासियत है।

बाखळ, बाबल, मालजादो, ठाण, ढांडा, छपरिया, गुङकै, पळींडै, पाळ, जुहार, गेङा, दकाळ, सैंथीर, हथाई, कांगसी, अकूरङी, थळगट, टमरका, भुंवाळी, झींटिया, बिसूंज्या, तिबारी, गळूंचिया, सांवटती, औळावै, फिरोळती, नागौरण, उगेरया, पङाल, डोभा, खिंपोळ्या, गिगनार, बिछिया, डबङी, गङा इत्याद सबद इण कविता संग्रै री कोरणी नै रूपास देवै। राजस्थानी संस्कारां अर हेत प्रीत रा बिम्बां सूं इण काव्यक्रिति रौ रूपास चौगणौ बधै।

बाळपणै सूं म्हैं लकीरां रा  लीक-लिकोळिया काढिया, नाटक करिया, पण पछै सै छूटग्या अर कविता म्हारै  जीयाजूण रौ  कवच बणगी। हूं इणरै साथै अपणै आप नै सुरक्षित मानूं।

और कांई हालचाल छै.!

थांरौ -
 डा.आईदानसिंह भाटी

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एक समर्थ कवि राज बिजारणिया
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-अश्वनी शर्मा, प्रशासनिक अधिकारी

by: Ashvani Sharma, jaipur (Notes) on Thursday, April 11, 2013 at 7:34pm

राजस्थान में बीकानेर के समीप भारतीय सेना के तोपाभ्यास हेतु ३३ गाँवों की जमीन अवाप्त की गयी। इन गाँवों में से ही एक गाँव मोटोलाई में जन्मे कवि राज बिजारणियां राजस्थानी के ऊर्जावान युवा कवि हैं। गत दिनों उन का भेजा राजस्थानी कविता संग्रह 'चाल भतूळिया रेत रमांखांटी राजस्थानी में लिखी गयी नये तेवर लिए ये कवितायेँ एक समर्थ कवि का परिचय देती हैं। 

राजस्थान की पीड़ा को उजागर करती कवितायेँ जहां माटी से जुडाव बताती हैं, वहीँ प्रेम कवितायेँ रेगिस्तान के दिल में बहती सजल धारा को उजागर करती हैं। अकाल के थपेड़ों से जर्जर रेगिस्तान के लिए बरसात का क्या मतलब होता है ये इन कविताओं को पढ़ कर पता चलता है।

बगूले के शब्द चित्र, आंधी का अर्थ और यादों के साए में पलते दर्द, ज़िन्दगी का अर्थ टटोलती ये कवितायेँ दिल के बहुत नज़दीक दस्तक देती हैं।

संग्रह का सब से अच्छा हिस्सा है विस्थापन के गहरे दर्द को समेटती कवितायेँ

आंटी लकड़यां
चकलो-बेलण
पींपो-चूल्हो
धणी-लुगाई
टाबर टोळी

मंडतो खिंडतो
खिंडतो मंडतो
पूरो-सूरो

....घर तो है

ये घर के होने होने की पीड़ा बहुत त्रासद है। ये घनीभूत पीड़ा कहीं कहीं मोटोलाई की पीड़ा से निकल वैश्विक परिदृश्य में निर्वासन की पीड़ा भोगते मानव मात्र की पीड़ा बन जाती है। यही कवि के सफल होने की परिचायक है।

मुझे संग्रह ने बहुत प्रभावित किया। युवा कवि को अनेकानेक साधुवाद.! मुझे इन कविताओं से परिचित होने का मौका देने के लिए.!!

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रेत राग नै अंवेरता आखर
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* डा- मदन गोपाल लढ़ा

जद सूं कविता प्रीत, प्रकृति अर धरती सूं अळघी हुयी है तद सूं पाठक देवता कविता सूं आंतरै हुयोड़ा दीसै। गणित रै सूत्रां तांई सबदां री कलाबाजी माडाणी घड़्योड़ी कवितावां रा कवि जोड़-तोड़ सूं पद पुरस्कार तो हासिल कर सकै पण पाठकां रो भरोसो कदी कोनी जीत सकै। छंदबद्ध हुवो चावै छंदमुगत, कविता में कवितापन हुवणो सै सूं जरूरी है। इण कवितापन नै आपां कविता री अंतस लय रै रूप में ओळख सकां। युवा कवि राजूराम बिजारणियांराजरी कवितावां री पैली पोथी ‘‘चाल भतूळिया रेत रमां’’ इण दीठ सूं घणी उम्मीदां जगावै।

इण पोथी री कवितावां में कवि रो मन आपरै आखती पाखती रै परिवेश नै सबद सूंपण सारू खूब रम्यो है पण भळैई आं कवितावां में दीठ रो नवोपन ताजगी रो अनुभव करावै। असल में कविता कवि रो घर हुवै। जियां एक लायकी लुगाई आपरै कच्चै पक्कै घर नै गारै गोबर अर रंग रोगन सूं सजायो संवार् यो राखै, उणींज भांत कविता रै फुटरापै में कवि री खामचाई प्रगटै। विषय वस्तु रो नवोपण, ओपती भाषा अर लय री पकड़ सूं राजूराम बिजारणियां कविता रै घर नै सांगोपांग संवारै।

च्यार खंडा में बंट्योड़ी इण पोथी रै पैले खंडआस रै जूण गेड़ैमें प्रकृति रा भांत-भंतीला रंग पळका मारै। पोथी री पैली कविताआभै रै लूमतै बादळ सूं/छुड़ाय हाथ/मुळकती-ढ़ुळकती/बा नान्ही सी छांट!/छोड़ देह रो खोळ/सैह परी बिछोह/गळगी हेत में/रळगी रेत में।’ (गळगी हेत में पृ. 11) मेह रो चितराम मांडै बठैई छांट रै रेत रळणै रै बिम्ब री मारफत कवि दरसण री भाव भौम माथै पूगतो दीसै। छांट सूं मूंडै माथै मुळक सांचरै पण बेरुत री बिरखा किरसै रै लिलाड़ माथै चिंता री लकीरां ल्या देवै।पटापटकविता में बात इण ढाळै प्रगटै-‘अमूझतै बादळ री/कूख सूं/धरती पर आई/नान्ही सी छांट रै मिस/अलेखूं मूंडां माथै/पसरी मुळक/खावण लागी गरणेटा/चिंतावां रै ओळै-दोळै/लारो-लार पड़ता/गड़ां रीपटापटसूं।        ( पटापट में पृ. 15) इण खंड में कठैई बादळ रै मिस प्रीत आभै उतरै तो कठैई धरती बादळ रै रूप में रूई रा चूंखा चुग प्रीत कातती दीसै।

अठैचिड़ी री चिंचाट/कागलै री कांव/कोयल री कूक/गैरां री गूटर-गूंजीया जूण में न्यारा निरवाळा रंग भरै तो पैली बार आरसी देखण रा दरसाव देख्या जा सकै। मरूधरा री रेत राग इण खंड रै सागै कवि रो मूळ सुर है। एक बानगी जोवो-‘मा-बापू/भंवण लाग्या/धरती सूं कीं बेसी/मनोमन भंवती/जुवान हुवती/छोरी री/चिंता में।( धरती होळै भंवै में पृ. 27)

दूजौ खंडचाल भतूळिया रेत रमांमें मरूभौम रो परिवेश मूंडै बोलतो सुणीजै। रेत रा ऊंचा ऊंचा धोरिया माथै आंधी अर भतूळियो नित नवी  कलाकारी करै। उन्हाळै में आंधी मत्तो कर धोरियां री ठौड़ फोर नाखै तो भतूळियो धोळै दिन में अंधारी अमावस उतार देवै। मरूधरा रो रैवासी प्रकृति रै इण रूप नै सदीव देखै-भोगै पण अठै कवि री कलम सबदां री मारफत आं री सांतरी छायाकारी करती लखावै।
आं चितरामां में कठैई छेल-भंवर भतूळियै नैं देख जुवान रेत मा पड़ाल री ओट में लुक जावै तो कठैई बटाऊ भतूळियो सासरै में सिलामी करतो निगै आवै। रेत अर भतूळियै रो मिलणो ढोला अर मरवण रै मिलणै सूं कींकर कम कोनी लागै। मांझळरात  में इण मिलण नै कवि इण भांत अरथावै -‘पोढी रेत/रळायां हेत/ले ढोलै नै ढोलियै/बांथमबांथ/भव सूं दूर/भंवती छियां/चढी अकासां/मिटावती भेद/दो होवण रो।’( मधरा मधरा बोलियै में पृ. 46-47)

तीजै खंडनेह बांटती मामें मा अर दादी री मारफत पारिवारिक समंधां री अंवेर करीजी है। बुगचै नैं फिरोळती दादी रै खुरदरै उणियारै में आपां बगत अर सरोकारां में आयोड़ै बदळावां नै ओळख सकां बठै मा री कारीगरी रै मिस आपां कवि री कारीगरी नै जोय सकां-‘ऊग्यां सूं लेय/बिसूंज्यां ताणीं/नित फाटतो जावै/घर/अर/लारो-लार/सींमती जावै/म्हारी मा../लखदाद है/मा री कारीगरी नै.!’             (कारीगरी में पृ. 62)

छेकड़लै खंडमन री थळगट पसर् यो मूनमें फायरिंग रेंज सारू 33 गावां रै विस्थापन री पीड़ घणी सुथराई सूं साम्हीं आवै। कवितावां इत्ती सबळी सांतरी है कै पाठक रो अंतस इण पीड़ सूं भर जावै अर आं री गूंज उणरै भीतर गूंजती रेवै। बात साव साची है कै जद एक गांव उजड़ै तो एक पूरी संस्कृति खतम हुय जावै। पीढियां रो सीर चुक जावै। ओळ्यां जोवो-‘ बां रै करतां /लीक-लिकोळिया/सरकारू कागद माथै../नक्सै सूं/मिटता गया नांव/म्हारा गांव/बणग्या/हिरोशिमा अर नागासाकी!’ (हिरोशिमा-नागासाकी में पृ. 80)

आं कवितावां री भाषा में राजस्थान रै गांवावूं अंचल री रळक मौजूद है। नावीं कवि ओम पुरोहितकागदरो मानणो है कैमुरधर रै भंडाण छेतर री बोली रा सबद अनै जूण जतन रा अबोट दीठाव कविता री मारक खिमता नै और बधावै। धारणा इण बात सूं पुखता हुवै कै बिजारणियां नानूराम संस्कर्ता री धरती रा कवि है अर भाषाई दीठ सूं नानूराम जी री परम्परा नैं आगै बधावता दीसै।

इण संग्रै री कैई कवितावां कच्ची कैरी दांई है, जैड़ी एक नवै कवि री हुया करै। पण कवितावां रै कथ्य री झीणी संवेदना अर लय नै साधती बुणगट इण बात रो पतियारो दिरावै कै बिजारणियां आवतै बगत  में कविता रै आंगणै ठावी ठौड़ बणावैला। युवा कवि रै पैलै पांवडै रो हियै तणो स्वागत है।

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चाल भतूळिया रेत रमां-कविता
कवि-राजूराम बिजारणियां,
पैली खेप-2012,
प्रकाशक-बोधि प्रकाशक, जयपुर,
पाना-96, मोल-85
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धरती री पीड़ प्रगटती कवितावां
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-श्रीभगवान सैनी

राजस्थान री धोरां धरती माथै रेत री कांई कमी? जठै रेत होवै, बठै भतूळिया उठै ई है। इण मरूभौम माथै रैवणियां मिनख भतूळियां सूं बांथैड़ो करता ई रैया है। पण भतूळियै मिनख नै हरमेस डरपायो है। आं मांय रागस, भूत अर जिन्न रो अक्स निगै आयो अर मिनख इण साथै रमणै सूं अळगो ई रैयो। पण इण धरती रो मानखो डर-डर जीवणो नीं सीख्यो है। कदै बळती लू अर कदै हाड कंपावती डांफर। आंधी-ओळां री मार अर पाणी री तिरस जैड़ी सगळी अबखायां सूं बांथैड़ो करतो अठै रो मिनख कठै ई हार नीं मानै अर नवी दीठ रो विगसाव करै।

राजूराम बिजारणियां ‘राज री कविता पोथी ‘चाल भतूळिया रेत रमां री कवितावां इणीज बात री साख भरै। संग्रै री 61 कवितावां च्यार खंडां-‘‘आस रै जूण गेड़ै’’, ‘‘चाल भतूळिया रेत रमां’’, ‘‘नेह बांटती मा’’ अर ‘‘मन री थळगट पसर्यो मून’’ मांय भेळीजी है। ‘‘आस रै जूण गेड़ै’’ खंड री कवितावां मांय मरूभौम री अबखायां सूं जूझतै मिनख री मनगत रा चितराम उकेरीज्या है जिकां री संवेदनावां गैरी अर दीठ सांतरी है। कवि अेक-अेक कवितावां नैं जीवै। संग्रै री पैली कविता ‘गळगी हेत में री ओळ्यां निजर है-‘आभै रै लूमतै बादळ सूं/छुड़ाय हाथ/मुळकती-ढ़ुळकती/बा नान्ही सी छांट!/छोड़ देह रो खोळ/सैह परी बिछोह/गळगी हेत में/रळगी रेत में।

दूजै खंड ‘’चाल भतूळिया रेत रमां’’ मांय कवि भतूळियै नै नवी उपमावां दीवी है जिकी कवि री झीणी समझ रै साथै भावां री रमझोळ धकै आगै बधै। ‘टोकी जोड़्या हाथ कविता री ओळ्यां देखो-‘देख पांवणा/चैकी आवता/ताण मौद में सिर/टोकी जोड़्या दोनूं हाथ/लगा सुसरैजी रै धोक/देवतो फेरी/बटाऊ भतूळियो।

 ‘‘नेह बांटती मा’’ खंड री कवितावां मांय कवि कंवळी संवेदनावां री पुड़तां खोलै अर परम्परावां नैं इतियास सूं नेह रो सांवठो सगपण दरसावै। इण संग्रै री कवितावां री अेक घणमोली बात आ है कै कमती सबदां मांय छोटी-छोटी ओळ्यां जीयाजूण री ऊंडी अबखायां नै अंवेरती आपरी पूरी खिमता साथै पाठक सूं सैमूंडै होवै अर बिना किणी आडंबर रै आपरी बात पाठक रै अंतस तांई पुगावै। ऊरमावान कवि नै घणा-घणा रंग।


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