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LOONKARANSAR, RAJASTHAN, India
..कि स्वंय की तलाश जारी है अपने और बैगानों के बीच !!

रविवार, 31 अगस्त 2008

राज बिजारनियाँ की छोटी कविताएँ

राम होने के लिए

हर युग में

राम को

ईश्वरत्व प्राप्ति के लिए

आवश्यकता पड़ती है

किसी ना किसी

रावण की.!

बाखल

पुरखों संग जुड़ा

बरसों पुराना

नाता तोड़कर

दहलीज को लाँघ

कमरे में

करीने से

सज्जे बेड पर

सिमट कर

आ बैठी है

बाखळ.!

थाली में श्मसान.!

अरी ! ओ

नन्ही सी जीभ!

अपने

क्षणिक स्वाद खातिर

क्यों बना देती हो तुम..

थाली में श्मसान.!

प्रश्न

हर बार

स्टोव फटने के बाद

क्यों आती है

सिर्फ

बहुओं के

जलने की ख़बर.!

क्या सास साथ लेकर

जन्मती है''स्टोव प्रुफ'' कवच.!

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

गीत

हमारी याद आएगी..!

(-राज बिजारनियाँ )

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

उठेगी हूक जो दिल में, तुम्हे रह-रहके रुलाएगी

कोई तनहा हो सोएगा

कोई यादें संजोएगा

कोई छुप-छुपके रोएगा

कोई पलकें भिगोएगा

करेंगे लाख कोशिशें, सभी नाकाम जाएगी

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

कभी तकरार की बातें

कभी खुशियों की सौगातें

कभी वो रूठना हमसे

कभी फूलों से महकाते

वक्त तो रेत है ऐसी, हाथ से छूट जाएगी

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

यहीं पाना यहीं खोना यहीं हंसना

यहीं रोना यहीं कहना यहीं सहना

यहीं जीना यहीं मरना

जिंदगी छाँव है ऐसी, कभी ना हाथ आएगी

जब हम नहीं होंगे, हमारी याद आएगी

राजस्थानी गंगा

ग़ज़ल

( राज बिजारनियाँ )

पाप रा धूप जळावै क्यूं

काया रोज गळावै क्यूं

काचरिया रो मोह छोडनै

तूम्बा बैल बधावै क्यूं

जिया जूण रा सांसा इतरा

मनडै नै भरमावै क्यूं

खोटा-खोटा काम घणा कर

जीवन बिरथ गमावै क्यूं

करम थांरा ई आडा आवै

आंसूडा ढळकावै क्यूं

ले गेंहू रा स्वाद सबडका

बाजरडी बिसरावै क्यूं

सोमवार, 25 अगस्त 2008

माँ में नेह अपार

(-राज बिजारनियाँ )

माँ के चरण कुरान है, बोली गीता सार

सब ग्रंथों की बानगी, माँ में नेह अपार

माँ की सेवा तीर्थ है, पूजा चारों धाम

माँ की करले बंदगी, वही रहीमन राम

क्या मदिना क्या अवध में, क्या काबा हरिद्वार

पान किया जिस दूध का, पावन गंगाधार

अपने मन को मारती, रोज हारती प्राण

ख़ुद की चिंता छोड़कर , रखती तेरा ध्यान

कोख में नौ माह तलक, पलछिन पाला जीव

जिसमें रमकर रात-दिन, भूली अंगना पीव

कतरा-कतरा दूध का, बना सुधारस धार

उसके बल खेता रहा, जीवन की पतवार

माँ तो दरिया प्रेम का, माँ है बैंकुट द्वार

चरण थामकर बावले, भवसागर कर पार

ख़ुद गीले में रात भर, तुझको रखती सूख

मल धोती मल पौंछती , नहीं ज़रा भी चूक

ना तो सिमरूं देवता, ना रखता उपवास

माँ की सेवा बंदगी, चरण धूलि अरदास

गंगा यमुना सरस्वती, झेलम सतलज व्यास

इन नदियों से ना बुझे, माँ चरणों की प्यास

बुधवार, 20 अगस्त 2008

कविता

कहाँ गई वो आजादी..?

हाथ पसारे भूखे प्यासे, नंगा नाच दिखाते हैं

चंद गेहूं के दानों खातिर, अपना लहू बहाते हैं

यहाँ-वहाँ खड़े हैं आहत, हाथ जोड़े ये फरियादी

कहाँ गई वो आजादी..?

भारत माँ के लाल-लाडले, तन पर नहीं लंगोटी है

कहीं बिलखते भूखे बच्चे, किसी हाथ में रोटी है

कैक्टस के जंगल की भांति बढ़ रही है आबादी

कहाँ गई वो आजादी..?

थैला भर नोटों के बदले, मुठ्ठी भर राशन पाते हैं

भरी दोपहरी रोते बच्चे, सबका दिल दहलाते हैं

अजगर बन गरीबी बढ़ती, चहुँ ओर है बर्बादी

कहाँ गई वो आजादी..?

गंगा का आंचल है मैला, घायल आज हिमालय है

भ्रष्टों से भगवान भी भागे, सूने पड़े शिवालय है

कंगूरों की चाहत सबको, नहीं नींव है बुनियादी

कहाँ गई वो आजादी..?

छोटी कविताएँ

ंसानों के घने जंगल में
रीबी की
मैली चद्दर में लिपटी
एक जिन्दा लाश !
रेत के ढेर का
एक अदद ठोकर से
कण-कण होकर
बिखर जाना !
घुंघट में छिपे
नुरानी चेहरे पर
तेजाब से बने
काले स्याह दाग सा !
जीवन की बलखाती
क्षितिज को छूती
लम्बी सड़क पर
एक छोटा सा स्पीड ब्रेकर !
हमारी और आपकी नजरें
देखती है
कोई मंजर
एक साथ!
मगर
बदल जाता है
दोनों के देखने का
नजरिया..!
अंतस की गहराईयों से निकल
यथार्थ को संवारनें के लिए
कुछ कर गुजरने की
तमन्ना लेकर उठते हैं-
ख्वाब.!

करे की गर्दन को

हलाल करते

उसे मिमियाते

दर्द से तड़फते छोड़

बीच में ही

चीख पड़ा

अपना

बड़ा सा

छूरा फैंककर

कसाई!

''अरे बशीर के बच्चे !

भागकर

दवा ला,

दिखता नहीं..?

कट गई है

अंगुली मेरी.!!''

मंगलवार, 12 अगस्त 2008

''कूंची के रंग,राज के संग..!!''

राज बिजारनियाँ द्वारा
बनाई गई विभिन्न कलाकृतियाँ

सोमवार, 11 अगस्त 2008

चलचित्र

दूरदर्शन के लिए बनी राजस्थानी ''टेलीफिल्म''
में साथी कलाकरों के साथ राज

रविवार, 10 अगस्त 2008

रंगमंच के झरोखों में राज..

नाटक -घर का चिराग नाटक - हम तो ऐसे हैं भईया नाटक - वतन की चिठ्ठी
नाटक - मिशन रेड अलर्ट
2001-2002राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का 'जवाहर लाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार ' मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से गृहण करते राज बिजारनियाँ, साथ में शिक्षामंत्री डॉ .बी.डी कल्ला एवं अकादमी अद्यक्ष डॉ.सोनाराम बिश्नोई !
ओम पुरोहित 'कागद ' की पोथी 'कुचरनी' का रेलगाड़ी में विमोचन करते हुए साहित्यकार रामस्वरूप किसान, राज एवं सत्यनारायण सोनी !
राज बिजारनियाँ की '' कुचमादी टाबर '' का विमोचन करते
विख्यात साहित्यकार नानूराम संस्कर्ता, डा. किरण नाहटा एवं
राज के पिता पुरखाराम बिजारनियाँ !